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विशेष लेख:नक्सलमुक्त इलाकों में गूंज रही स्कूल की घंटी, लौट रही शिक्षा की रौनक

  जहां कभी बारूद की गंध और बंदूक की आवाज थी, वहां अब बच्चे गा रहे राष्ट्रगान धनंजय राठौर संयुक्त संचालक, जनसंपर्क रायपुर, 4 सितंबर 2026।...

 



जहां कभी बारूद की गंध और बंदूक की आवाज थी, वहां अब बच्चे गा रहे राष्ट्रगान

धनंजय राठौर
संयुक्त संचालक, जनसंपर्क

रायपुर, 4 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित इलाकों में दो दशकों के लंबे इंतजार के बाद एक नई सुबह दस्तक दे रही है। जिन गांवों में कभी बारूद की गंध और बंदूक की आवाजें सुनाई देती थीं, वहां अब स्कूल की घंटी गूंज रही है। बच्चे किताबें लेकर स्कूल पहुंच रहे हैं और कक्षाओं में राष्ट्रगान की आवाज सुनाई दे रही है। यह बदलाव केवल शिक्षा की वापसी नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा और लोकतंत्र की मजबूत होती नींव का प्रतीक भी है।

5 सितंबर को देशभर में पूर्व राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती शिक्षक दिवस के रूप में मनाई जाएगी। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ का बस्तर और उसके दूरस्थ अंचल एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहे हैं। कभी नक्सली खौफ के कारण वर्षों तक बंद रहे स्कूलों में फिर से बच्चों की चहल-पहल दिखाई देने लगी है। लंबे अंतराल के बाद जब किसी गांव में स्कूल की घंटी बजती है, तो उसकी आवाज सिर्फ पढ़ाई शुरू होने का संकेत नहीं होती, बल्कि उस क्षेत्र में लौटती शांति और विश्वास की भी गूंज होती है।

600 से अधिक स्कूल फिर हुए संचालित

छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास, सुरक्षा और जनकल्याणकारी नीतियों तथा ‘नियद नेल्ला नार’ जैसी योजनाओं के प्रभाव से दक्षिण बस्तर के सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव दिखाई दे रहा है। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में करीब दो से ढाई दशकों से बंद पड़े 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को जिला प्रशासन और पुलिस बल के सहयोग से फिर शुरू किया गया है।

नक्सली हिंसा में क्षतिग्रस्त या ध्वस्त किए गए कई स्कूल भवनों को दोबारा संवारा गया है। कुछ भवनों का इस्तेमाल सुरक्षा बलों के कैंप के रूप में भी हुआ था। अब इन्हीं स्थानों को फिर से बच्चों के अनुकूल शैक्षणिक वातावरण में बदला जा रहा है।

शिक्षकों ने संभाली बदलाव की कमान

इन क्षेत्रों में शिक्षा की लौ जलाने में स्थानीय शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। विपरीत और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद शिक्षकों ने बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का अपना दायित्व निभाया है। दूरस्थ वनांचल में वे केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों से उनकी स्थानीय भाषा और बोली में संवाद कर स्कूल के प्रति उनका विश्वास और जुड़ाव मजबूत कर रहे हैं।

गोंडी, हल्बी और डोरली जैसी स्थानीय बोलियों में संवाद से बच्चों और शिक्षकों के बीच दूरी कम हुई है। शिक्षकों ने ग्रामीणों और लंबे समय तक नक्सली भय के साए में रहे अभिभावकों से भी संपर्क किया। उनके प्रयासों से कई गांवों के बच्चे फिर ब्लैकबोर्ड, किताब और स्कूल की दुनिया से जुड़ पाए हैं।

जहां भवन नहीं, वहां छप्पर में पढ़ाई

बीजापुर के पीड़िया, गंपूर और तमोड़ी जैसे गांवों तथा सुकमा के कई अंदरूनी इलाकों में वर्षों से बंद स्कूलों को फिर संचालित किया गया है। जिन पक्के स्कूल भवनों को नक्सलियों ने आईईडी से उड़ा दिया था, वहां ग्रामीणों ने प्रशासन के सहयोग से बांस और तिरपाल से अस्थायी कक्ष तैयार किए, ताकि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो।

स्थानीय भाषा की चुनौती से निपटने और बच्चों में विश्वास पैदा करने के लिए स्थानीय शिक्षित युवाओं को ‘शिक्षा दूत’ के रूप में जोड़ा गया है। ये युवा बच्चों और स्कूल के बीच सेतु का काम कर रहे हैं। शिक्षक दिवस पर ऐसे शिक्षक और शिक्षा दूत वास्तव में बदलाव के नायक बनकर सामने आए हैं।

तकनीक से जुड़ रहा बस्तर का बचपन

दोबारा शुरू हुए स्कूलों में अब केवल पारंपरिक तरीके से पढ़ाई नहीं हो रही है। कई वनांचल स्कूलों में स्मार्ट कक्षाओं, टैबलेट और डिजिटल सामग्री के माध्यम से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को भी आधुनिक शिक्षा के संसाधनों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

शिक्षा के साथ खेल और पोषण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। स्कूलों में मध्याह्न भोजन और ‘न्योता भोजन’ के साथ खेल सामग्री उपलब्ध कराई गई है। इससे बच्चों में स्कूल आने के प्रति रुचि बढ़ी है और विद्यालयों में उनकी उपस्थिति में भी सुधार देखने को मिला है।

सुरक्षा से मजबूत हुआ भरोसा

‘नियद नेल्ला नार’ योजना के तहत गांवों और सुरक्षा कैंपों के आसपास सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से शिक्षकों का स्कूल तक पहुंचना आसान हुआ है। अब कई शिक्षक नियमित रूप से इन दुर्गम इलाकों में पहुंचकर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। सुरक्षा के साथ शिक्षा की पहुंच बढ़ने से ग्रामीणों में भी भविष्य को लेकर विश्वास मजबूत हो रहा है।

घंटी की आवाज में छिपी नई उम्मीद

छत्तीसगढ़ में इस बार का शिक्षक दिवस उन शिक्षकों और शिक्षा दूतों को समर्पित है, जो राज्य के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। बंदूक की आवाज को पीछे छोड़ जब कलम और किताब आगे बढ़ती है, तो बदलाव की नई कहानी लिखी जाती है।

नक्सलमुक्त इलाकों में गूंजती स्कूलों की घंटी इसी बदलाव का प्रतीक है। यह घंटी बता रही है कि जिन गांवों में कभी भय का साया था, वहां अब बच्चों के सपने आकार ले रहे हैं। शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि शांति, विकास और सामाजिक बदलाव की सबसे मजबूत नींव है। बस्तर के इन इलाकों में लौटती शिक्षा की रौनक इसी नई भोर की कहानी कह रही है।


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