रायपुर, 2 सितंबर 2026। बस्तर के सुदूर और दुर्गम अबुझमाड़ के जंगलों से अब बदलाव की नई बयार बह रही है। कभी नक्सलवाद के साए और घरेलू चौखट तक ...
रायपुर, 2 सितंबर 2026। बस्तर के सुदूर और दुर्गम अबुझमाड़ के जंगलों से अब बदलाव की नई बयार बह रही है। कभी नक्सलवाद के साए और घरेलू चौखट तक सीमित रहने वाली नारायणपुर और ओरछा विकासखंड की ग्रामीण महिलाएं अब अपने हौसले और कड़ी मेहनत से आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। वन विभाग की दूरदर्शी पहल ने इन महिलाओं के सपनों को पंख देने के साथ ही चक्रिय निधि के माध्यम से उन्हें आर्थिक संबल दिया है। इससे वे सफल उद्यमी के रूप में आगे बढ़ रही हैं।
आजीविका गतिविधियों से जुड़कर अपने पैरों पर खड़ी महिलाएं
वर्ष 2026-27 में शासन की मंशा के अनुरूप क्षेत्र के 10 महिला स्व-सहायता समूहों को 37 लाख रुपए की चक्रिय निधि से ऋण उपलब्ध कराया गया। इस आर्थिक मदद ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार किया है। जय बिहान, जगदम्बा, मां लक्ष्मी, मां शीतला, मां दंतेश्वरी, मां दुर्गा, मां सरस्वती, मां अम्बे और जय वाला कारयो जैसे समूहों से जुड़ी दीदियां आज अलग-अलग आजीविका गतिविधियों से जुड़कर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।
कोई जंगलों से इमली और माहुल पत्ता एकत्र कर दोना-पत्तल बना रही है, तो कोई कच्चे फूलझाड़ू का प्रसंस्करण कर उसे बाजार तक पहुंचा रही है। गृह उद्योग के तहत मसाला निर्माण, बेकरी, कैंटीन और किराना स्टोर का सफल संचालन कर इन महिलाओं ने साबित किया है कि अवसर और आर्थिक सहयोग मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं।
बच्चों की बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य का भी बढ़ा भरोसा
इस बदलाव का सबसे खूबसूरत पहलू इन परिवारों के जीवन में आई खुशहाली है। स्वरोजगार से होने वाली नियमित आय ने महिलाओं में न केवल आत्मविश्वास बढ़ाया है, बल्कि अब वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी सक्षम हो रही हैं।
समाज की मुख्यधारा से जुड़कर आर्थिक रूप से मजबूत होती अबुझमाड़ की ये महिलाएं आज महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास की प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं। जंगलों की छांव में शुरू हुआ यह बदलाव अब स्वावलंबन की ऐसी राह बना रहा है, जिस पर चलकर महिलाएं अपने परिवार के साथ पूरे क्षेत्र के विकास में भी भागीदारी निभा रही हैं।

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