दंतेवाड़ा के 21 परिवारों तक पहुंची आधुनिक तकनीक, जिला प्रशासन और क्रेडा की पहल से सौर ऊर्जा से चला सामुदायिक टीवी धनंजय राठौर, संयुक्त संचाल...
दंतेवाड़ा के 21 परिवारों तक पहुंची आधुनिक तकनीक, जिला प्रशासन और क्रेडा की पहल से सौर ऊर्जा से चला सामुदायिक टीवी
धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक एवं आमना खान, सहायक संचालक, जनसंपर्क
रायपुर, 4 नवंबर। दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के सुदूर और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में अब विकास की नई किरण पहुंचने लगी है। दशकों तक नक्सलवाद के साये में रहे कुआकोंडा विकासखंड के लावा गांव में पहली बार टेलीविजन की आवाज गूंजी। जिला प्रशासन के सहयोग से छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (क्रेडा) ने यहां कम्युनिटी सोलर टीवी स्थापित किया है। महज 21 परिवारों की आबादी वाले इस आदिवासी गांव के लिए यह किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। ग्रामीणों ने पहली बार अपने गांव में टेलीविजन स्क्रीन देखी और आधुनिक दुनिया से जुड़ने का नया माध्यम पाया।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस पहल पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बस्तर के दूरदराज और अंतिम छोर पर बसे गांवों तक विकास, शिक्षा और आधुनिक तकनीक की रोशनी पहुंचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। लावा गांव में सामुदायिक सोलर टीवी की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि विकास अब नक्सलवाद के अंधेरे को पीछे छोड़कर आदिवासी भाई-बहनों के जीवन तक पहुंच रहा है।
उन्होंने कहा कि सुदूर इलाकों के बच्चे और ग्रामीण जब पहली बार टीवी पर देश-दुनिया की खबरें और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम देखेंगे, तो उनके सपनों को नई उड़ान मिलेगी। राज्य सरकार बस्तर के समग्र विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
पहाड़ी और पथरीले रास्तों से गुजरकर पहुंचते हैं ग्रामीण
बैलाडीला की ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा लावा गांव भौगोलिक रूप से बेहद दुर्गम है। किरंदुल के मुख्य लौह अयस्क खनन क्षेत्र (एनएमडीसी) से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित इस गांव तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़क नहीं है। ग्रामीणों को राशन दुकान से चावल जैसी बुनियादी जरूरतों का सामान लाने के लिए भी पहाड़ी और पथरीले रास्तों से मीलों पैदल चलना पड़ता है।
दशकों तक नक्सलवाद के खौफ में रहा इलाका
लावा और आसपास का पुरेंगल क्षेत्र लंबे समय तक घोर नक्सल प्रभावित रहा। घने जंगलों और दुर्गम रास्तों का फायदा उठाकर नक्सलियों ने इस क्षेत्र को अपना गढ़ बना रखा था। इसके चलते वर्षों तक प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की पहुंच यहां तक नहीं हो पाती थी। सुरक्षा कारणों से गांव आधुनिक सुविधाओं और बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह कटा रहा। बुनियादी सुविधाओं का पहुंचना ग्रामीणों के लिए किसी सपने जैसा था।
सुरक्षा बलों के प्रयासों से बदला माहौल
सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और सतर्कता से अब इस क्षेत्र में नक्सलवाद का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। कभी दहशत के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके में अब विकास की गतिविधियां तेज हो रही हैं। हाल के दिनों में जिला कलेक्टर और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने स्वयं गांव पहुंचकर ग्रामीणों से मुलाकात की और उनकी समस्याएं सुनीं। सुरक्षा और विश्वास के बदले माहौल में अब प्रशासन सीधे ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ पहुंचाने में जुटा है।
सोलर टीवी से शिक्षा, सूचना और मनोरंजन की सुविधा
पारंपरिक बिजली ग्रिड से दूर होने के कारण लावा गांव में सौर ऊर्जा आधारित सामुदायिक टीवी स्थापित किया गया है। इससे गांव के सभी 21 परिवारों को एक साथ आधुनिक सूचना और मनोरंजन के साधन उपलब्ध होंगे।
देश-दुनिया की खबरों से जुड़ेंगे ग्रामीण: टीवी के माध्यम से ग्रामीण छत्तीसगढ़, देश और दुनिया की गतिविधियों से रूबरू हो सकेंगे। साथ ही उन्हें सरकारी योजनाओं, कृषि तकनीकों और स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां भी मिल सकेंगी।
बच्चों को मिलेगा ज्ञानवर्धक वातावरण: गांव के बच्चों को मनोरंजन के साथ शैक्षणिक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम देखने का अवसर मिलेगा। इससे उनके सामान्य ज्ञान और सीखने-समझने की क्षमता को बढ़ावा मिलेगा।
सामाजिक मेलजोल को मिलेगा बढ़ावा: सामुदायिक टीवी होने से गांव के सभी परिवार एक स्थान पर एकत्र होकर कार्यक्रम देख सकेंगे। दिनभर खेती और वनोपज संग्रहण में मेहनत करने वाले ग्रामीणों को शाम के समय मनोरंजन का साधन मिलेगा। इससे आपसी मेलजोल भी बढ़ेगा।
सौर ऊर्जा से मिलेगी निर्बाध सुविधा: बिजली की पारंपरिक लाइनों से दूर होने के कारण सोलर पैनल आधारित टीवी गांव के लिए उपयोगी साबित होगा। यह व्यवस्था पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ पारंपरिक बिजली आपूर्ति पर निर्भरता भी कम करेगी।
दशकों तक नक्सलवाद के खौफ और विकास से दूरी झेलने वाला लावा गांव अब सौर ऊर्जा और आधुनिक सूचना तंत्र के माध्यम से नए दौर में प्रवेश कर रहा है। जिला प्रशासन और क्रेडा की यह पहल बताती है कि विकास की योजनाएं अब बस्तर के सुदूर गांवों और अंतिम छोर पर बसे परिवारों तक पहुंच रही हैं।

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