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असम तक पहुंची गौरेला-पेंड्रा-मरवाही की पहचान, राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में छाया विष्णु भोग चावल

 गौरेला पेंड्रा मरवाहीSun, 11 Oct 2026 ,छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और विशिष्ट कृषि उत्पादों की पहचान अब दूसरे राज्य...



 गौरेला पेंड्रा मरवाहीSun, 11 Oct 2026 ,छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और विशिष्ट कृषि उत्पादों की पहचान अब दूसरे राज्यों तक पहुंच रही है। असम के गुवाहाटी में आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के शिक्षक संजय कुमार नामदेव ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पारंपरिक खानपान और कला की विशेषताओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इस दौरान उन्होंने जिले के प्रसिद्ध विष्णु भोग चावल की खूबियों से भी दूसरे राज्यों के प्रशिक्षार्थियों को परिचित कराया।

केंद्र सरकार के सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, नई दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 18 राज्यों के 159 प्रशिक्षार्थी भाग ले रहे हैं। 14 अक्टूबर तक चलने वाले इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ से 15 प्रशिक्षार्थी शामिल हुए हैं। इनमें पेंड्रा विकासखंड के शिक्षक संजय कुमार नामदेव जिले का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

प्रशिक्षण के दौरान संजय कुमार नामदेव ने छत्तीसगढ़ के राजकीय प्रतीकों, पारंपरिक परिधानों, रहन-सहन, खानपान, प्रमुख त्योहारों, औद्योगिक क्षेत्रों और प्राकृतिक सौंदर्य की जानकारी साझा की। उन्होंने सुआ, कर्मा और ददरिया जैसी लोक परंपराओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विशिष्टता को सामने रखा। उनकी प्रस्तुति से दूसरे राज्यों से आए प्रशिक्षार्थियों को छत्तीसगढ़ की परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता को समझने का अवसर मिला।

इस कार्यक्रम का खास आकर्षण गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले का विष्णु भोग चावल रहा। शिक्षक संजय नामदेव ने प्रशिक्षण केंद्र में उपस्थित लोगों को यह चावल भेंट किया और इसकी विशिष्ट सुगंध, स्वाद एवं गुणवत्ता की जानकारी दी। इस पहल के जरिए जिले के विशिष्ट कृषि उत्पाद को असम तक पहुंचाने और छत्तीसगढ़ की कृषि विरासत को व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया गया।

कार्यक्रम में प्रशिक्षार्थियों को जूट शिल्प, टेराकोटा कला, केन एवं बांस शिल्प, लोक चित्रकला, कठपुतली निर्माण तथा माइम एंड मूवमेंट जैसी गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य शिक्षकों को कला आधारित शिक्षण के नए तरीकों से परिचित कराना है, ताकि वे विद्यार्थियों को भारतीय कला और संस्कृति की जानकारी अधिक प्रभावी ढंग से दे सकें।

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