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कांकेर राजमहल दशहरा, 60 से अधिक गांवों के आंगा देव जुटे, राजपरिवार ने की विशेष पूजा अर्चना

कांकेरOctober 20, 2026:छत्तीसगढ़ के कांकेर रियासत में दशहरा मनाने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही ह...



कांकेरOctober 20, 2026:छत्तीसगढ़ के कांकेर रियासत में दशहरा मनाने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है. विजयादशमी के अवसर पर राजपरिवार के तरफ से आंगा देव सहित अंचल के देवी-देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना की गई. इस दौरान आसपास के 60 से अधिक गांवों के आंगा देव बाजे-गाजे के साथ राजमहल पहुंचे. राजपरिवार के मुखिया डॉ. आदित्य प्रताप देव ने विधि विधान से विशेष पूजा अर्चना की और कांकेर वासियों की सुख समृद्धि की कामना की.

कांकेर दशहरा और आंगा देव का महत्व

कांकेर में दशहरे का यह आयोजन अपनी अनूठी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है. परंपरा के अनुसार, दशहरे से करीब एक सप्ताह पहले आसपास के गांवों के आंगा देव शहर स्थित मंदिरों में एकत्रित होने लगते हैं. इसके बाद विजयादशमी के दिन पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन के बीच देवी-देवताओं को राजमहल लाया जाता है, जहां राजपरिवार द्वारा उनकी पूजा-अर्चना की जाती है.

इस वर्ष भी राजमहल में आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला. विभिन्न गांवों से पहुंचे देवी-देवता पारंपरिक बाजे-गाजे की धुन पर झूमते नजर आए. देवी-देवताओं के दर्शन और इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बनने के लिए शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु राजमहल पहुंचे.

कांकेर दशहर में देवी देवताओं की पूजा

कांकेर राजपरिवार के मुखिया डॉ. आदित्य प्रताप देव ने बताया कि कांकेर रियासत में दशहरा मनाने की परंपरा अन्य स्थानों से अलग है. यहां केवल विजयादशमी मनाने तक ही यह आयोजन सीमित नहीं है, बल्कि अंचल के पूर्वज देवी-देवताओं को आमंत्रित कर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है. इस परंपरा के माध्यम से समाज की विभिन्न सकारात्मक शक्तियों को एक साथ जोड़कर आपसी तालमेल और संतुलन स्थापित करने का संदेश मिलता है.

कांकेर राजपरिवार के सदस्य डॉ. आदित्य प्रताप देव  

कांकेर अंचल के अलग-अलग क्षेत्रों से चिवरांज, बांसला, सरोना, दुधावा, आंगा देव, शीतला, बूढ़ादेव और लमसेना सहित विभिन्न देवी-देवता अपनी पारंपरिक शैली और लय के साथ इस आयोजन में शामिल होते हैं. सभी देवी-देवताओं की उपस्थिति सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक मानी जाती है- डॉ आदित्य प्रताप देव, मुखिया, कांकेर राजपरिवार


200 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन

स्थानीय शहरवासी निराकांत तिवारी के अनुसार कांकेर राजमहल में दशहरे के दिन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की परंपरा राजशाही के समय से चली आ रही है. उनके पूर्वज भी अपने-अपने गांवों के मंदिरों से आंगा देव को राजमहल लाते थे, जहां राजपरिवार द्वारा विधिवत पूजा की जाती थी.


इस परंपरा की वास्तविक शुरुआत कब हुई, इसकी निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा दो सौ वर्ष से भी अधिक पुरानी हो सकती है- निराकांत तिवारी, स्थानीय निवासी, कांकेर


विजयादशमी पर आम लोगों के लिए खुलता है गेट

राजमहल का दरवाजा एक दिन विजयदशमी के दिन आम लोंगों के लिए खुलता है. जहां पर पुराने जमाने की वस्तुएं बाग़ शेर ,भालू और अन्य जीवों के खाल और सिर का भाग है. जिसे देखने की परमिशन आम लोगों को दी जाती है.


कांकेर राजमहल के अंदर की तस्वीरें 

दशहरे के दिन राजमहल में होने वाला यह आयोजन आज भी कांकेर की ऐतिहासिक विरासत, जनजातीय आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है. इस अवसर पर राजपरिवार और श्रद्धालु देवी-देवताओं से क्षेत्र में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद मांगते हैं

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