कृष्ण की बांसुरी से लेकर गोवर्धन तक, हर कथा में छिपा है प्रकृति के साथ जीने का संदेश ✍️विजय शंकर द्विवेदी जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण...
कृष्ण की बांसुरी से लेकर गोवर्धन तक, हर कथा में छिपा है प्रकृति के साथ जीने का संदेश
✍️विजय शंकर द्विवेदी
जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है। यह उस जीवन-दर्शन को याद करने का अवसर भी है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही जीवन-चक्र के हिस्से हैं। आधी रात को मंदिरों में जब कान्हा के जन्म की घंटियां बजती हैं, घरों में झूले सजते हैं, माखन-मिश्री का भोग लगता है और गलियों में ‘नंद के आनंद भयो’ गूंजता है, तब शायद हमें एक पल ठहरकर यह भी पूछना चाहिए कि जिस कृष्ण को हम पूज रहे हैं, उनके आसपास की प्रकृति आज कैसी है?
कृष्ण की कल्पना कीजिए। उनके साथ यमुना है, कदंब के पेड़ हैं, गोवर्धन है, गायें हैं, मोर हैं, बांसुरी है, खुला आकाश है और वृंदावन की हरियाली है। यह संयोग नहीं है। कृष्ण का जीवन प्रकृति से इतना गहरे जुड़ा है कि उनकी कथा से प्रकृति को अलग कर दें तो कृष्ण का एक बड़ा संसार ही अधूरा हो जाता है। ब्रज की संस्कृति में कदंब, यमुना, गोवर्धन और गोचारण भूमि का महत्व इसी व्यापक संबंध की याद दिलाता है।
आज जब हम जन्माष्टमी मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब यह सवाल पहले से कहीं अधिक जरूरी है कि क्या हमारी श्रद्धा प्रकृति तक पहुंच रही है? क्या कान्हा के नाम पर सजाए गए मंदिर के बाहर खड़ा पेड़ भी हमें उतना ही अपना लगता है? क्या यमुना जैसी नदियां केवल धार्मिक आस्था का विषय हैं या उनके स्वच्छ जल की जिम्मेदारी भी हमारी है? क्या गोवर्धन की पूजा केवल एक परंपरा है या पहाड़, जंगल, जल और जमीन के संरक्षण का संदेश भी?
कृष्ण की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक गोवर्धन पर्वत से जुड़ी है। कथा का धार्मिक अर्थ अपनी जगह है, लेकिन उसके भीतर एक गहरा सामाजिक और प्राकृतिक संदेश भी दिखाई देता है। गोवर्धन केवल पत्थरों का ढेर नहीं था। वह घास देता था, पेड़-पौधों को आश्रय देता था, पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराता था और वर्षाजल के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा था। कृष्ण ने ब्रजवासियों का ध्यान उस प्रकृति की ओर खींचा, जो उनके जीवन का वास्तविक आधार थी। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का यह भाव आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज हमारा संकट यही है कि हम प्रकृति से लेते बहुत हैं, लौटाते बहुत कम हैं। पहाड़ काटकर सड़कें बनती हैं, जंगल हटाकर बस्तियां बसती हैं, नदियों में नालों का पानी पहुंचता है और जमीन के भीतर से लगातार पानी खींचा जाता है। विकास जरूरी है, लेकिन विकास और विनाश के बीच की रेखा मिट जाए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या बचेगा? कृष्ण का गोवर्धन हमें इसी सीमा की याद दिलाता है।
यमुना की पुकार सुन पाएगा आधुनिक समाज?
कृष्ण और यमुना का संबंध केवल धार्मिक कथाओं का हिस्सा नहीं है। यमुना उनके बाल्यकाल की साक्षी है। उसी के किनारे उनका बचपन बीता, उसी के तट पर उनकी अनेक लीलाओं की कल्पना की गई और उसी नदी को ब्रज की संस्कृति ने जीवनदायिनी माना।
कालिया नाग की कथा को भी यदि आज के संदर्भ में देखें तो इसमें नदी प्रदूषण के खिलाफ एक प्रतीकात्मक चेतावनी दिखाई देती है। यमुना का जल विषैला हो जाना केवल एक पौराणिक घटना के रूप में पढ़कर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। आज देश की अनेक नदियां औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज, प्लास्टिक और रासायनिक प्रदूषण से जूझ रही हैं। ऐसे में कृष्ण की यमुना हमें जैसे आईना दिखाती है—जिस नदी को हमने माता कहा, उसके साथ हमने किया क्या?
जन्माष्टमी पर यदि हम यमुना के तट पर दीप जलाएं, पूजा करें, फूल चढ़ाएं और अगले दिन उसी नदी में प्लास्टिक, कपड़े या पूजन सामग्री डाल दें, तो हमारी श्रद्धा अधूरी है। नदी की पूजा का सबसे बड़ा अर्थ नदी को स्वच्छ रखना होना चाहिए।
कृष्ण के लिए जल केवल पूजा की वस्तु नहीं, जीवन था। आज भी यही सत्य है। जिस दिन नदियां सूखेंगी, तालाब मिटेंगे और भूजल समाप्त होगा, उस दिन केवल धार्मिक अनुष्ठानों से जीवन नहीं बचेगा। इसलिए जन्माष्टमी का एक संकल्प यह भी हो सकता है कि हम अपने आसपास के किसी तालाब, कुएं, नदी या जलस्रोत को गंदा नहीं होने देंगे।
कदंब का पेड़ और बांसुरी का संगीत
कृष्ण की स्मृतियों में कदंब वृक्ष का विशेष स्थान है। ब्रज की परंपराओं में कृष्ण और कदंब का संबंध बार-बार सामने आता है। यमुना तट और कदंब की डालियों से जुड़ी कृष्ण की लीलाओं ने इस वृक्ष को सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बना दिया।
सोचिए, यदि वृक्ष नहीं होंगे तो कृष्ण की वह कल्पना कैसी होगी जिसमें कान्हा कदंब की छांव में बांसुरी बजाते हैं? यदि जंगल नहीं होंगे तो मोर कहां नाचेंगे? यदि तालाब नहीं होंगे तो पशु-पक्षी पानी कहां पीएंगे? यदि खेतों में हरियाली नहीं होगी तो गोपाल की वह दुनिया कहां बचेगी?
हमने आधुनिक जीवन में पेड़ों को अक्सर केवल ‘हरित क्षेत्र’ या ‘सुंदरता’ के रूप में देखना शुरू कर दिया है। जबकि वृक्ष जीवन की बुनियादी जरूरत हैं। वे हवा को शुद्ध करते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं, मिट्टी को बचाते हैं, वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने में मदद करते हैं और अनगिनत जीवों को आश्रय देते हैं।
इस जन्माष्टमी पर एक पौधा लगाना इसलिए केवल पर्यावरणीय गतिविधि नहीं, बल्कि कृष्ण की प्रकृति-परंपरा से जुड़ने का एक सरल माध्यम हो सकता है। पौधा लगाकर उसे भूल जाना पर्याप्त नहीं। उसकी देखभाल करना ही असली पूजा है।
गोपाल का संदेश केवल गाय तक सीमित नहीं
कृष्ण का एक नाम गोपाल भी है। उनके बाल रूप की कल्पना गायों के बीच होती है। गाय यहां केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, ग्रामीण जीवन और कृषि व्यवस्था का भी हिस्सा रही है। कृष्ण की गोचारण लीलाएं मनुष्य और पशु के सहअस्तित्व की उस संस्कृति की याद दिलाती हैं जिसमें पशु परिवार और अर्थव्यवस्था दोनों का हिस्सा थे।
आज शहरों के विस्तार के बीच पशुओं के लिए चरागाह कम होते जा रहे हैं। पक्षियों के घोंसले छिन रहे हैं। पेड़ों की कटाई के साथ छोटे-छोटे जीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त हो रहा है। ऐसे समय में कृष्ण का गोपाल रूप हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य अकेला जीव नहीं है जिसे इस धरती पर रहने का अधिकार है।
प्रकृति का अर्थ केवल पेड़ नहीं है। उसमें गाय है, गौरैया है, मोर है, तितली है, मधुमक्खी है, नदी की मछली है और वह अनगिनत सूक्ष्म जीवन भी है जिसे हम देख तक नहीं पाते। इनके अस्तित्व के बिना हमारी दुनिया भी अधूरी है।
जन्माष्टमी की सजावट या पर्यावरण की जिम्मेदारी?
हर साल जन्माष्टमी पर शहर रोशन होते हैं। मंदिर सजते हैं, झांकियां निकलती हैं, मटकी फोड़ कार्यक्रम होते हैं। यह उत्सव हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक ऊर्जा का प्रतीक है। लेकिन उत्सव की चमक के साथ पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है।
प्लास्टिक की सजावट, अत्यधिक कचरा, तेज ध्वनि और अनावश्यक बिजली की खपत को कम किया जा सकता है। मिट्टी के दीये, प्राकृतिक फूल-पत्तियां, कपड़े और पुन: उपयोग होने वाली सजावट अपनाई जा सकती है। झांकियों में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा सकता है। बच्चों को कृष्ण की कहानियों के साथ जल बचाने, पेड़ लगाने और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनने की सीख दी जा सकती है।
यानी जन्माष्टमी को केवल देखने का उत्सव न बनाकर सीखने का उत्सव बनाया जा सकता है।
कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश : संतुलन
कृष्ण का जीवन हमें संतुलन सिखाता है। वे बांसुरी भी बजाते हैं और युद्धभूमि में अर्जुन को कर्म का संदेश भी देते हैं। वे माखन चुराने वाले नटखट बालक भी हैं और गीता का गंभीर दर्शन देने वाले योगेश्वर भी। वे गोपियों के प्रिय हैं, गोपाल हैं, सारथी हैं और नीति के मार्गदर्शक भी।
यही बहुआयामी व्यक्तित्व हमें प्रकृति के संदर्भ में भी संतुलन का पाठ पढ़ाता है। विकास चाहिए, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं। शहर चाहिए, लेकिन हरियाली मिटाकर नहीं। सड़कें चाहिए, लेकिन जलस्रोतों को खत्म करके नहीं। उद्योग चाहिए, लेकिन नदियों को जहरीला बनाकर नहीं।
आज जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, सूखते जलस्रोत और घटती जैव विविधता पूरी दुनिया के सामने चुनौती हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं होगा। समाज को भी अपनी जीवनशैली बदलनी होगी।
सच्ची भक्ति वही, जिसमें प्रकृति के लिए जगह हो
हम कृष्ण को फूल चढ़ाते हैं। इससे अधिक सुंदर क्या होगा कि उसी कृष्ण की स्मृति में एक वृक्ष भी बचाया जाए। हम उन्हें माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं। इससे बड़ा क्या होगा कि किसी भूखे पशु को भोजन दिया जाए। हम यमुना की आरती करते हैं। इससे जरूरी क्या होगा कि अपने शहर की नदी को कचरे से बचाया जाए। हम गोवर्धन की पूजा करते हैं। इससे बड़ा सम्मान क्या होगा कि पहाड़, जंगल और जमीन के प्राकृतिक स्वरूप की रक्षा की जाए?
कृष्ण को समझने के लिए केवल उनकी मूर्ति के सामने खड़ा होना पर्याप्त नहीं। उनके जीवन के संदेश को अपने व्यवहार में उतारना भी जरूरी है।
जन्माष्टमी की रात जब मंदिरों में कान्हा का जन्म हो, तब हम अपने भीतर भी एक नए विचार का जन्म कराएं—ऐसा विचार जिसमें प्रकृति केवल संसाधन नहीं, परिवार हो।
कृष्ण की बांसुरी हमें आज भी बुला रही है। वह बांसुरी शायद कह रही है कि जीवन केवल मनुष्य का उत्सव नहीं है। इसमें पेड़ों की हरियाली भी है, नदियों की धारा भी, मिट्टी की खुशबू भी, पशु-पक्षियों की आवाज भी और खुला आकाश भी।
अगर हम सचमुच कृष्ण को अपना आराध्य मानते हैं तो उनकी धरती को बचाना भी हमारी जिम्मेदारी है।
इस जन्माष्टमी पर मंदिर में दीप जलाएं, घर में झूला सजाएं, कान्हा को माखन-मिश्री का भोग लगाएं—लेकिन साथ ही एक संकल्प जरूर लें : एक पेड़ बचाएंगे, एक जलस्रोत को स्वच्छ रखेंगे, किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा नहीं देंगे और अपने हिस्से की प्रकृति अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित छोड़ेंगे।
क्योंकि कृष्ण की पूजा केवल उनकी तस्वीर के सामने नहीं होती। कृष्ण वहां भी हैं जहां जीवन है। और जीवन वहीं बचेगा, जहां प्रकृति बचेगी।
यही जन्माष्टमी का सबसे आधुनिक और शायद सबसे जरूरी संदेश है—कान्हा को पूजना है तो उनकी प्रकृति को भी बचाना होगा।

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