प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से गांधीराम की बदली जिंदगी, 4 लाख रुपए अनुदान से शुरू किया मछली पालन रायपुर, 24 सितंबर 2026। सही योजना, म...
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से गांधीराम की बदली जिंदगी, 4 लाख रुपए अनुदान से शुरू किया मछली पालन
रायपुर, 24 सितंबर 2026। सही योजना, मेहनत और सरकारी सहयोग मिले तो सीमित संसाधनों में भी आत्मनिर्भरता की राह बनाई जा सकती है। ग्राम बरदूला निवासी गांधीराम अजगल्ले ने इसे साबित किया है। आर्थिक तंगी और सीमित साधनों से जूझ रहे गांधीराम ने मत्स्य पालन को आजीविका का साधन बनाया और अब इससे सालाना 5 से 8 लाख रुपए तक का शुद्ध लाभ कमा रहे हैं।
4 लाख रुपए के अनुदान से शुरू किया कारोबार
गांधीराम को यह अवसर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मिला। उन्होंने अपनी जमीन पर 0.20 हेक्टेयर जलक्षेत्र में तालाब लाइनर का निर्माण कराया। इस परियोजना की कुल लागत 16.80 लाख रुपए थी, जिसमें सरकार की ओर से उन्हें 4 लाख रुपए का अनुदान मिला।
सरकारी सहायता से तालाब तैयार होने के बाद उन्होंने नियमित देखरेख और बेहतर प्रबंधन के साथ मछली पालन शुरू किया। छोटे से जलक्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दिया और धीरे-धीरे यह व्यवसाय उनके परिवार की आय का मजबूत आधार बन गया।
सालाना 100 क्विंटल मछली का उत्पादन
गांधीराम के 0.20 हेक्टेयर के तालाब से अब हर साल औसतन 100 क्विंटल मछली का उत्पादन हो रहा है। बाजार में बिक्री और अन्य खर्च निकालने के बाद उन्हें सालाना 5 से 8 लाख रुपए तक का शुद्ध लाभ मिल रहा है।
आर्थिक तंगी से आत्मनिर्भरता तक
योजना का लाभ मिलने से पहले गांधीराम के लिए परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी चुनौती थी। उन्होंने दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय मत्स्य पालन को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया। आज इसी व्यवसाय से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और भविष्य के लिए भी बेहतर आधार तैयार हुआ है।
गांधीराम अजगल्ले ने बताया कि योजना के तहत मिले सरकारी सहयोग ने कमाई का नया रास्ता खोला। अब परिवार की जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं और आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई है।
सेवा संकल्प अभियान में सामने आई बदलाव की कहानी
‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत सरकार की योजनाओं से लोगों के जीवन में आए बदलाव की ऐसी कहानियां सामने लाई जा रही हैं। गांधीराम अजगल्ले की सफलता यह बताती है कि सरकारी सहायता का सही उपयोग और मेहनत मिलकर सीमित संसाधनों को भी आत्मनिर्भरता के मजबूत साधन में बदल सकते हैं।

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