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200 साल में 68% सिमटी दिल्ली की यमुना, 89% घटा जल प्रवाह; रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर

दिल्ली यूनिवर्सिटी और IISER भोपाल के अध्ययन में खुलासा, बैराज, तटबंध, नहरें और अतिक्रमण बने नदी के सिकुड़ने की बड़ी वजह नई दिल्ली। दिल्ली से...





दिल्ली यूनिवर्सिटी और IISER भोपाल के अध्ययन में खुलासा, बैराज, तटबंध, नहरें और अतिक्रमण बने नदी के सिकुड़ने की बड़ी वजह



नई दिल्ली। दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना नदी पिछले करीब दो सौ वर्षों में अपने प्राकृतिक स्वरूप का बड़ा हिस्सा खो चुकी है। दिल्ली विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), भोपाल के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिल्ली में यमुना की औसत चौड़ाई लगभग 68 प्रतिशत घट गई है, जबकि नदी के जल प्रवाह (डिस्चार्ज) में 89 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि बैराजों, तटबंधों, नहरों के निर्माण और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह और विस्तार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।


जर्नल ऑफ जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया में प्रकाशित इस अध्ययन में दिल्ली के 50 किलोमीटर लंबे यमुना क्षेत्र का विश्लेषण किया गया। इसके लिए वर्ष 1799 के ऐतिहासिक नक्शों, पुराने टोपोग्राफिक सर्वे, सैटेलाइट तस्वीरों और नदी की चौड़ाई से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संपत कुमार टंडन, शोधकर्ता तान्या तथा IISER भोपाल के कुमार गौरव सहित अन्य विशेषज्ञ शामिल रहे।


रिसर्च के मुताबिक, वर्ष 1799 में यमुना की औसत चौड़ाई करीब 647-658 मीटर थी, जो वर्ष 2020 तक घटकर लगभग 210 मीटर रह गई। इसी अवधि में नदी का अनुमानित जल प्रवाह करीब 30,000 घन मीटर प्रति सेकंड से घटकर लगभग 3,900 घन मीटर प्रति सेकंड रह गया। अध्ययन में बताया गया कि नदी की चौड़ाई लगातार कम होने, चैनल बार (रेतीले द्वीप) घटने, तटबंधों के निर्माण और बाढ़ क्षेत्र पर अतिक्रमण ने यमुना के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है।


शोधकर्ताओं के अनुसार ताजेवाला, हथिनीकुंड, वजीराबाद, आईटीओ और ओखला बैराजों के निर्माण के साथ विभिन्न नहर परियोजनाओं ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को सीमित कर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रोफेसर विमल सिंह के अनुसार, ऊपरी हिस्सों में बने बैराजों और नहरों के कारण यमुना का बड़ा हिस्सा पहले ही मोड़ दिया जाता है, जिससे दिल्ली पहुंचते-पहुंचते नदी में पानी की मात्रा काफी कम रह जाती है। वहीं बढ़ते शहरीकरण और फ्लडप्लेन पर अतिक्रमण ने नदी के फैलाव की प्राकृतिक क्षमता को और सीमित कर दिया।


अध्ययन में यह भी सामने आया कि पिछले लगभग 100 वर्षों में यमुना के करीब एक-तिहाई फ्लडप्लेन तटबंधों और शहरी निर्माण के कारण नदी से कट चुके हैं। इसका असर वर्ष 2023 की बाढ़ के दौरान भी देखने को मिला। शोधकर्ताओं के मुताबिक, उस समय जल प्रवाह 1978 की भीषण बाढ़ से कम होने के बावजूद दिल्ली में यमुना का रिकॉर्ड जलस्तर दर्ज किया गया, क्योंकि बाढ़ का पानी प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र में फैलने के बजाय संकरे नदी मार्ग में ही सीमित रह गया।


यमुना में बदलाव की प्रमुख टाइमलाइन


1799: मुक्त प्रवाह वाली यमुना का ऐतिहासिक उल्लेख।

1873: ताजेवाला बैराज का निर्माण।

1874: ओखला बैराज का निर्माण।

1959: वजीराबाद बैराज बना।

1967: आईटीओ बैराज का निर्माण।

1999: हथिनीकुंड बैराज अस्तित्व में आया।

2023: दिल्ली में यमुना का रिकॉर्ड जलस्तर दर्ज।


अध्ययन के निष्कर्ष में शोधकर्ताओं ने कहा है कि लगातार बैराजों, नहरों, तटबंधों और शहरी विस्तार के कारण यमुना अब 'लोअर फ्लो' (कम जल प्रवाह वाली) नदी का स्वरूप ले चुकी है। यदि नदी के प्राकृतिक फ्लडप्लेन का संरक्षण नहीं किया गया और जल प्रवाह बहाल करने के उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में बाढ़ और जल संकट जैसी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।

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