निजी भूमि पर बने कूप से सालभर सिंचाई, वार्षिक आय 45 हजार से बढ़कर 1.50 लाख रुपये हुई रायपुर, 30 जुलाई। राज्य सरकार की विकसित भारत-रोजगार और ...
निजी भूमि पर बने कूप से सालभर सिंचाई, वार्षिक आय 45 हजार से बढ़कर 1.50 लाख रुपये हुई
रायपुर, 30 जुलाई। राज्य सरकार की विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण किसानों के लिए बदलाव की नई कहानी लिख रही है। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के राजपुर विकासखंड के ग्राम पतरापारा निवासी किसान अरुण इसकी जीवंत मिसाल बनकर उभरे हैं। मिशन के तहत उनकी निजी भूमि पर बने कूप ने वर्षा आधारित खेती को सिंचित और लाभकारी कृषि में बदल दिया है।
कुछ वर्ष पहले तक अरुण की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर थी। समय पर वर्षा होने पर ही धान की अच्छी फसल मिलती थी, जबकि बारिश कम होने पर उत्पादन प्रभावित हो जाता था। सिंचाई के स्थायी साधन के अभाव में वे साल में केवल एक फसल ही ले पाते थे और रबी सीजन की खेती लगभग असंभव थी।
वर्ष 2025-26 में मिशन के तहत उनके खेत में निजी कूप का निर्माण स्वीकृत हुआ। कूप बनने के बाद खेत को स्थायी सिंचाई सुविधा मिली और खेती का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। अब अरुण धान के साथ-साथ गेहूं और मौसमी सब्जियों की भी खेती कर रहे हैं। उनकी बाड़ी में उगाई जा रही सब्जियां परिवार की जरूरतें पूरी करने के साथ अतिरिक्त आमदनी का भी जरिया बन गई हैं।
करीब 6.5 एकड़ भूमि में वर्षभर सिंचाई उपलब्ध होने से खेती की उत्पादकता बढ़ी है। पहले जहां उनकी वार्षिक आय लगभग 45 हजार रुपये थी, वहीं अब बढ़कर 1.50 लाख रुपये तक पहुंच गई है। समय पर सिंचाई मिलने से लागत की तुलना में बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा मिलने लगा है।
किसान अरुण बताते हैं कि पहले बारिश रुकते ही खेती की चिंता सताने लगती थी, लेकिन अब अपने खेत के कूप से जरूरत के अनुसार सिंचाई कर लेते हैं। गेहूं और सब्जियों की खेती शुरू होने से आय बढ़ी है और परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से काफी मजबूत हुई है। अब वे बच्चों की पढ़ाई, खेती में निवेश और घरेलू जरूरतों को भी आसानी से पूरा कर पा रहे हैं।
अरुण ने इस परिवर्तन के लिए शासन-प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। स्थायी सिंचाई सुविधा मिलने से खेती अब अधिक सुरक्षित, लाभकारी और आत्मनिर्भर बन गई है। यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को टिकाऊ बनाने की दिशा में प्रभावी साबित हो रही है।


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