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बिलासपुर हाईकोर्ट का फैसला: आबकारी घोटाले में अनिल टुटेजा व अनवर ढेबर समेत 5 को जमानत

बिलासपुर। बहुचर्चित आबकारी घोटाला मामले में जेल में बंद पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा और कारोबारी अनवर ढेबर समेत पांच आरोपियों को बड़ी राहत मिली ...




बिलासपुर। बहुचर्चित आबकारी घोटाला मामले में जेल में बंद पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा और कारोबारी अनवर ढेबर समेत पांच आरोपियों को बड़ी राहत मिली है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के बाद सभी को जमानत प्रदान कर दी।


जस्टिस अरविंद वर्मा की सिंगल बेंच ने यह आदेश जारी किया। आरोपियों की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन परगनिहा और शशांक मिश्रा ने पक्ष रखा। अदालत ने पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, अनवर ढेबर, यश पुरोहित, नितेश पुरोहित और दीपेंद्र चावला को जमानत देने का आदेश दिया है।


3200 करोड़ के घोटाले का आरोप


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के दौरान वर्ष 2019 से 2023 के बीच कथित 3200 करोड़ रुपए के आबकारी घोटाले का खुलासा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने किया था। आरोप है कि शराब नीति में बदलाव कर चहेते सप्लायरों को फायदा पहुंचाया गया। नकली होलोग्राम के जरिए सरकारी दुकानों में शराब बेची गई और शासन को भारी राजस्व नुकसान पहुंचाया गया।


ईडी की जांच के बाद आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने भी एफआईआर दर्ज की थी। मामले में पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा, पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, अनवर ढेबर सहित कई अधिकारी और कारोबारी आरोपी बनाए गए थे। आरोपियों में आबकारी विभाग के 28 अधिकारी भी शामिल हैं।


पहले खारिज हो चुकी थीं याचिकाएं


सत्र न्यायालय से जमानत निरस्त होने के बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां पहले उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली। हालांकि, पांच माह बाद पुनः हाईकोर्ट में जमानत याचिका लगाने की अनुमति दी गई थी।


ताजा सुनवाई में कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था और सोमवार को आदेश सुनाते हुए जमानत मंजूर कर ली।


जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे टुटेजा और ढेबर


हालांकि अनिल टुटेजा और अनवर ढेबर को ईओडब्ल्यू ने 550 करोड़ रुपए के डीएमएफ (जिला खनिज न्यास) घोटाले में भी आरोपी बनाया है। इस मामले में जमानत नहीं मिलने के कारण दोनों फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे।


वहीं नितेश पुरोहित, दीपेंद्र चावला और यश पुरोहित के जेल से रिहा होने का रास्ता साफ हो गया है।


क्या है शराब घोटाला?


जांच एजेंसियों के अनुसार, शराब नीति में बदलाव कर लाइसेंस की शर्तें इस प्रकार तय की गईं कि चुनिंदा कंपनियों को लाभ मिल सके। इन कंपनियों ने कथित तौर पर नकली होलोग्राम और सील तैयार करवाई। आरोप है कि नकली होलोग्राम लगी महंगी शराब की बोतलें सरकारी दुकानों के माध्यम से बेची गईं, जिससे वास्तविक बिक्री का आंकड़ा शासन तक नहीं पहुंचा और एक्साइज टैक्स की चोरी होती रही।


जांच में यह भी सामने आया कि शासन को हजारों करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। मामले में कई नेताओं, अधिकारियों और कारोबारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि कुछ को पूर्व में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है।


फिलहाल हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है।

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