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भाजपा सहकारिता प्रकोष्ठ के संयोजक ने धान उठाव को लेकर की समीक्षा

Aber news -भाजपा सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक शशिकांत द्विवेदी ने धान खरीदी के बाद केंद्रों में धान का उठाव न होने पर शुक्रवार को प्रे...


Aber news -भाजपा सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक शशिकांत द्विवेदी ने धान खरीदी के बाद केंद्रों में धान का उठाव न होने पर शुक्रवार को प्रेस कॉन्फे्रंस की। इस दौरान उन्होंने केंद्रों में व्याप्त अव्यवस्था को लेकर पत्रकारों से चर्चा की।  

सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रेस कॉन्फे्रंस के महत्वपूर्ण बिंदु

प्रदेश के उपार्जन केन्द्रों में लगभग 31 लाख मीट्रिक टन धान अभी भी पड़ा हुआ है। जिसका जल्द से परिवहन कराया जाकर संग्रहण केन्द्रों में भण्डारित किया जाए। क्योकि संग्रहण केन्द्रों में मात्र लगभग 16 लाख मीट्रिक टन धान शेष है। जबकि क्षमता लगभग 36 लाख मीट्रिक टन है।
उपार्जन केन्द्रों को अघोषित रूप से सग्रहण केन्द्र बना दिया गया है। जिसका परिवहन किया जाना लगभग डेढ़ माह से बंद है। उपार्जन केन्द्रो में भी धान के सूखत से आयी कमी /शार्टेज की प्रतिपूर्ति के लिए व्यवस्था किया जाए। क्योंकि संग्रहण केन्द्रों को शार्टेज हेतु 1 प्रतिशत का प्रावधान है। किन्तु तब जब कई महीने धान संग्रहण केन्द्रो में पड़ा रहता था। संग्रहण केन्द्रों में धान क्षमता का 40 प्रतिशत ही शेष है ऐसी स्थिति में वहां का धान जल्दी उठने की संभावना है। अत: उपार्जन केन्द्रों में भी शार्टेज के प्रावधान किये जाने की आवश्यकता है। खाद्या एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री अमरजीत भगत ने शुक्रवार को खाद्य अधिकारियों की वर्चुअल बैठक में कहा की उपार्जन (खरीदी केन्द्रों में रखे धान की सुरक्षा की जिम्मेदारी खरीदी करने वाली समितियों की होगी। धान भीगने या अन्य किसी प्रकार के नुकसान होने की स्थिति में उन्हे ही भरपाई करनी होगी।) इस प्रकार मैं मंत्री जी से प्रतिप्रश्न करता हूं कि उनके द्वारा बनाई गयी धान खरीदी नीति में स्पष्ट उल्लेख है कि उपार्जन केन्द्रों में बफर लिमिट से ज्यादा खरीदे गये धान को 72 घंटे में अनिवार्य रूप से उठाया जाएगा। तो क्या इसका पालन हो रहा है ?
धान खरीदी नीति में इसका भी उल्लेख है कि यदि परिवहनकर्ता धान का उठाव नहीं करता है तो उसी दर पर सोसाईटिया धान का परिवहन कर संग्रहण केन्द्रों में पहुंचाएगी, लेकिन कई सोसाइटियों ने परिवहन के लिए अनुमति मांगी किंतु अनुमति नहीं मिली। साथ ही नीति में इसका भी उल्लेख है खरीदी केन्द्रों से धान का उठाव 31 मार्च तक अनिवार्य रूप से करा लिया जायेगा। जो परिलक्षित नही हो रहा है। उपार्जन केन्द्र में भारत सरकार द्वारा धान की अच्छी औसत किस्म हेतु निर्धारित मापदण्ड के आधार पर 17 प्रतिशत माश्चर तक धान खरीदी किये जाने का उल्लेख है। उसके आधार पर खरीदी के समय 15 से 17 प्रतिशत माश्चर पर धान खरीदी की गई है। किंतु धान डिलवरी के समय 9.4, 10 प्रतिशत अधिकतम माश्चर आ रहा है। इस प्रकार से 6 से 7 प्रतिशत सूखत आ रहा है। जिसकी भरपाई शासन को करनी चाहिए। भाजपा शासन काल से ही सहकारी समितियों के उत्थान व प्रोत्साहन के लिए 5 रुपए प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दिये जाने का प्रावधान है। किन्तु शर्त रहती थी कि धान निराकरण के समय जीरो प्रतिशत शार्टेज आना चाहिए। इस प्रकार अधिकांश समितियों को जीरों प्रतिशत शार्टेज आने पर कमीशन के अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी मिलती थी। किन्तु गत वर्ष से सोसाईटिया इनकी गलत निति के कारण भारी घाटे में जा रही है। शार्टेज की राशि कमीशन से काट ली जाती है। जो उचित नहीं है।  हम मांग करते हैं कि कांग्रेस के द्वारा किये गये वादे के अनुकूल गत 2 वर्षो का बोनस 300 रु. प्रति क्विंटल की दर से दिया जाए। धान का मूल्य 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से दिये जाने का वादा पूरा नहीं हुआ। उसे पूरा करें।  पुनर्गठन के बाद प्रदेश में बनी 725 नवीन सोसाटियों में खरीदे गये धान के रख रखाव एवं सुरक्षा के लिय कैंप कव्हर आदि के व्यवस्था के लिए अतिरिक्त धन राशि का अंबटन किया जाए। सहकारिता का सरकारीकरण किया जा रहा है। निर्वाचित बोर्ड को भंग करने अथवा नीलम्बित करने की घोर साजिस चल रही है। उसे बंद किया जावें। यथा पुनर्गठन के नाम पर 1333 पैक्स व लैम्पस को भंग किया गया। पुनर्गठन के बाद पुन: कुछेक सोसाईटियों के बोर्ड को पुन: भंग किया गया। जिस पर मान. उच्च न्यायालय से रोक लगी। दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, अम्बिकापुर , जगदलपुर सहकारी बैंकों के चुनाव षडयंत्र पूर्वक रोक दिया गया है। जब राज्य सहकारी निर्वाचन आयोग का गठन हुआ है तो निर्वाचन पर सरकार क्यों दखल दे रही है। सहकारियों समितियों में किसान सदस्य होते हैं और उसमें किसानों की शेयर पूंजी लगी रहती है। उन्ही शेयर के विरूध ब्याज का प्रावधान नही रहा है। किन्तु लभांश दिया जाता है। इन परिस्थियों में समितियों में घाटा होने के कारण लाभांश नहीं दिया जा सकता है। इससे  किसानों को आर्थिक हानि होगी। इसके लिये कौन जिम्मेदार है।


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