कनेक्टिविटी, इको-टूरिज्म और स्थानीय कला-हस्तशिल्प को बढ़ावा; होमस्टे से ग्रामीण परिवारों के लिए आय और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर रायपुर,...
कनेक्टिविटी, इको-टूरिज्म और स्थानीय कला-हस्तशिल्प को बढ़ावा; होमस्टे से ग्रामीण परिवारों के लिए आय और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
रायपुर, 23 सितंबर। बस्तर की पहचान अब उसके प्राकृतिक सौंदर्य, जनजातीय संस्कृति, कला, परंपराओं और आतिथ्य के साथ पर्यटन के नए अवसरों से भी जुड़ रही है। चित्रकोट-तीरथगढ़ के जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, कुटुमसर और कैलाश गुफाएं, मां दंतेश्वरी मंदिर, दलपत सागर और बस्तर पैलेस जैसे स्थल प्रकृति, रोमांच, अध्यात्म और इतिहास का अनुभव देते हैं। यहां पर्यटन केवल दर्शनीय स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय जीवन, खान-पान, हस्तशिल्प, लोकनृत्य और संगीत से जुड़ने का माध्यम भी बन रहा है।
सड़क, हवाई और रेल कनेक्टिविटी से बढ़ेंगी संभावनाएं
पर्यटन के विस्तार के लिए कनेक्टिविटी को अहम आधार माना जा रहा है। ‘बस्तर 2.0’ ब्लूप्रिंट में 228 नई सड़कों और 267 पुलों के निर्माण का प्रस्ताव है। इससे दूरस्थ क्षेत्रों को बेहतर संपर्क मिलने की उम्मीद है।
जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी एयरपोर्ट से रायपुर और हैदराबाद के लिए हवाई संपर्क उपलब्ध है। वहीं रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना भविष्य में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को और विस्तार दे सकती है। बेहतर संपर्क से पर्यटकों के साथ स्थानीय उत्पादों, ग्रामीण बाजारों और पर्यटन आधारित रोजगार को भी लाभ मिलने की संभावना है।
होमस्टे से गांव सीधे जुड़ रहे पर्यटन से
ग्रामीण और जनजातीय होमस्टे को बस्तर में पर्यटन विस्तार की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विकसित किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ होमस्टे नीति 2025-30 के तहत पर्यटकों को स्थानीय परिवारों के साथ रहकर ग्रामीण जीवन, जनजातीय संस्कृति, कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक खान-पान का अनुभव देने की दिशा में काम हो रहा है।
नए कमरे के निर्माण पर प्रति कमरा एक लाख रुपए और पुराने कमरे के नवीनीकरण पर 50 हजार रुपए की सहायता का प्रावधान है। एक से नौ कमरों तक सहायता की व्यवस्था से ग्रामीण परिवार अपनी क्षमता के अनुसार होमस्टे शुरू कर सकते हैं। वर्तमान में 85 हितग्राहियों के अनुदान के प्रस्ताव बैंकों को भेजे जा चुके हैं, जबकि 27 होमस्टे छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के साथ पंजीकृत हैं।
होमस्टे का असर केवल संचालक परिवार तक सीमित नहीं रहता। भोजन, स्थानीय गाइड, परिवहन, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए आसपास के लोगों के लिए भी आय के अवसर बनते हैं।
संस्कृति बनी पर्यटन की पहचान
बस्तर की जनजातीय संस्कृति पर्यटन की प्रमुख विशेषता है। बेलमेटल और धातु शिल्प, लकड़ी-बांस की कला, पारंपरिक आभूषण, नृत्य, संगीत और स्थानीय खान-पान पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
बस्तर पंडुम जैसे आयोजन इस सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच दे रहे हैं। वर्ष 2026 के बस्तर पंडुम में जनजातीय संस्कृति की 12 विधाओं को मंच मिला और करीब 55 हजार आदिवासी लोगों की सहभागिता हुई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मौजूदगी में हुए आयोजन से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिला।
आस्था से एडवेंचर तक पर्यटन के कई रंग
बस्तर में धार्मिक, सांस्कृतिक, इको और एडवेंचर टूरिज्म की संभावनाएं एक साथ मौजूद हैं। मां दंतेश्वरी मंदिर और बस्तर दशहरा धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन का आधार हैं, वहीं कांगेर घाटी और धुड़मारास प्रकृति एवं रोमांच आधारित पर्यटन के नए केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।
धुड़मारास में एडवेंचर पर्यटन, ग्लास ब्रिज और कैनोपी वॉक जैसी सुविधाओं की योजना बनाई जा रही है। गांव का यूएन टूरिज्म बेस्ट टूरिज्म विलेज डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए चयन भी ग्रामीण पर्यटन की संभावनाओं को सामने लाता है।
45 युवाओं को पर्यटन प्रबंधन का प्रशिक्षण
पर्यटन विकास को स्थानीय रोजगार से जोड़ने के लिए बस्तर के पर्यटन रोडमैप के तहत 45 युवाओं को पर्यटन प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है। होमस्टे संचालक, गाइड, स्थानीय ड्राइवर, भोजन सेवा से जुड़े लोग, हस्तशिल्प विक्रेता, कलाकार और एडवेंचर टूरिज्म से जुड़े युवा इस उभरती पर्यटन अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं।
बस्तर में पर्यटन का विस्तार इस सोच के साथ आगे बढ़ रहा है कि प्रकृति और जनजातीय संस्कृति की मौलिकता बरकरार रखते हुए स्थानीय समुदाय को आर्थिक अवसर मिलें। सड़क और हवाई कनेक्टिविटी, होमस्टे, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक आयोजन और इको-टूरिज्म मिलकर बस्तर के पर्यटन परिदृश्य को नया आकार दे रहे हैं।


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